साधु की साधना और श्रावक की आराधना से आगे बढ़ता है धर्म मार्ग : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
मधुबन (गिरिडीह)---- विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल शिखर जी मधुबन स्थित गुणायतन में आयोजित प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि धर्म की सशक्त परंपरा साधु की साधना और श्रावक की आराधना के समन्वय से ही आगे बढ़ती है। उन्होंने कहा कि साधु अपनी तपस्या, संयम और आत्मशुद्धि से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करता है, जबकि श्रावक श्रद्धा, सेवा, दान और सहयोग के माध्यम से उस आदर्श को समाज में स्थापित करता है। जब ये दोनों प्रवाह एक साथ चलते हैं, तभी धर्म का मार्ग सुदृढ़, प्रभावी और स्थायी बनता है।यह जानकारी गुणायतन मध्यभारत के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने देते हुए बताया कि मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि केवल साधु की साधना पर्याप्त नहीं होती, क्योंकि साधना प्रेरणा देती है पर उसे समाज में फैलाने का कार्य श्रावक करता है। उसी प्रकार यदि केवल आराधना हो और साधना का आदर्श न हो तो आराधना औपचारिक बनकर रह जाती है। इसलिए धर्म की प्रगति के लिए साधना और आराधना दोनों का संतुलन आवश्यक है।मुनि श्री ने धर्म के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म बाहरी आडंबर या प्रदर्शन का विषय नहीं है। धर्म तब जीवित रहता है जब व्यक्ति के भीतर आत्मशुद्धि की भावना जागृत होती है। जीवन के प्रत्येक चरण में सावधानी, विचारों की पवित्रता और लक्ष्य की स्पष्टता जरूरी है। जब मनुष्य यह निश्चय करता है कि उसे धर्ममार्ग पर ही चलना है, तभी उसके जीवन की दिशा बदलती है और जीवन सार्थक बनता है।उन्होंने “दान तीज” के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दान का अर्थ केवल धन देना नहीं, बल्कि अपने भीतर के लोभ का त्याग करना है। दान त्याग, समर्पण और करुणा की भावना को विकसित करता है। जब व्यक्ति दान देता है तो उसका अहंकार घटता है, लोभ कम होता है और भीतर संवेदना का विकास होता है। यही संवेदना आगे चलकर साधना का आधार बनती है। मन की शुद्धि के बिना साधना संभव नहीं, और शुद्ध मन से ही धर्म का वास्तविक अनुभव होता है।
मुनि श्री ने दान के विविध रूपों का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु-संतों के प्रति आहार दान, तीर्थों में पूजा दान, ग्रंथों के माध्यम से ज्ञान दान तथा जरूरतमंदों के लिए अभय दान—ये सभी दान की महत्वपूर्ण विधाएँ हैं। इन दानों के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को पुण्य और पवित्रता से जोड़ता है। साधना से प्रेरणा मिलती है, दान से प्रवृत्ति बनती है और दोनों मिलकर धर्म को पुष्ट करते हैं।उन्होंने सूत्र रूप में समझाते हुए कहा कि दान से मन की शुद्धि होती है और साधना से मोक्षमार्ग सुरक्षित होता है। जब मन शुद्ध होता है तो व्यक्ति धर्म को केवल सुनता नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारता है। यही जीवन की वास्तविक साधना है।अंत में मुनि श्री ने कहा कि “दान धर्म का द्वार है और साधना धर्म का सार है।” जब समाज दान की भावना को अपनाता है और साधना के मार्ग पर चलने का प्रयास करता है, तब धर्म का प्रकाश स्थायी रूप से प्रकट होता है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे दान, सेवा और साधना को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं, ताकि धर्म की परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे और समाज में आध्यात्मिकता का वातावरण सुदृढ़ हो।इस अवसर पर संघस्थ मुनि श्री संघान सागर महाराज, मुनि श्री सार सागर महाराज मुनि श्री समादर सागर महाराज, मुनि श्री रुप सागर महाराज के साथ क्षेत्र पर विराजमान मुनि आर्यिकाश्री एवं त्यागी बृति उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन ब्र. अशोक भैया एवं ब्र. अभय भैया ने किया


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